Saturday, October 5, 2013

प्रियंका को टक्कर देतीं कंगना!


बॉलीवुड फिल्मों के शौकीनों को अपने पहले सुपर हीरो ‘कृष’ की अगली मूवी कृष-3 का बेसब्री से इंतजार है। हॉलीवुड जैसे स्पेशल इफ्ेट्स, बेहतरीन एक्शन सीक्वेंस और शानदार लोकशंस के साथ इस बार दर्शकों को इसमें दो खूबसूरत हीरोइनों को एक साथ देखने का मौका मिलेगा। अभी तक कृष सीरीज की फिल्मों में एक ही हीरोइन होती थी, लेकिन इस बार राकेश रोशन ने इसमें दो हीरोइनों को लिया है। कृष में हृतिक रोशन के साथ रहीं प्रियंका चोपड़ा इस बार भी उनके साथ नजर आएंगी, वहीं फिल्म के मुख्य विलेन विवेक ओबेराय के संग ‘मानवर’(म्यूटेंट) का किरदार निभा रहीं कंगना रणावत भी ग्लैमर का तड़का लगाती दिखाई देंगी। हाल-फिलहाल दिखाए जा रहे फिल्म के ट्रेलर और गानों में प्रियंका हमेशा की तरह खूबसूरत लग रही हैं, लेकिन एक गाने में हृतिक के साथ दिख रहीं कंगना भी जबरदस्त हॉट लग रही हैं। अब तक आई अपनी लगभग सभी फिल्मों में कंगना में बोल्ड किरदार ही निभाए हैं। ‘फैशन’ में ड्रग्स और सफलता के नशे में डूबी मॉडल शोनाली हो या ‘तनु वेड्स मनु’ की बिंदास तनु, कंगना ने अपने सभी किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। मधुर भंडारकर की ‘फैशन’ के बाद यह पहला मौका है जब प्रियंका और कंगना एक साथ नजर आएंगी। फैशन में अपनी जबरदस्त एक्टिंग और ग्लैमर से प्रियंका को कड़ी टक्कर देने वाली कंगना इस फिल्म में क्या कमाल करेंगी इसके लिए उनके फैन्स को थोड़ा इंतजार करना होगा।

Thursday, October 3, 2013

पहले रामदेव, फिर अन्ना, अब वीके

अभिनव सिन्हा
अंग्रेजी शासन काल से मुक्ति दिलाने वाली कांग्रेस अब धीरे-धीरे अंग्रेजों जैसा ही व्यवहार करने लगी है। अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज का दमन करना उसकी फितरत बन गई है। पहले सिर्फ विपक्षी पार्टियों के खिलाफ अपनी जांच एजेंसियों का प्रयोग करने वाली कांग्रेस नीत केंद्र सरकार अब गैर राजनीतिक लोगों पर भी सीधा हमला करने लगी है।
सपा-बसपा को सीबीआई के डर से अपने पाले में रखने वाली कांग्रेस ने समर्थन वापस लेने पर डीएमके प्रमुख करुणानिधि के खानदान के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाई की, उससे उसकी नीयत साफ हो गई। डीएमके नेताओं के समर्थन वापस लेते ही पड़े सीबीआई के छापे दूसरे समर्थन दे रहे दलों के लिए स्पष्ट संकेत था कि अगर समर्थन नहीं तो जेल में जाने को तैयार रहें। कार्रवाई का खौफ इस कदर दलों में समाया हुआ है कि वे अपना वोट बैंक बचाने और जनता की नजरों में बने रहने के लिए हर बात पर विरोध के स्वर बुलंद करते रहते हैं, लेकिन जब समर्थन की वापसी की बात आती है तो मुद्दों के आधार और सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने की दुहाई देने लगते हैं। हालांकि, सच्चाई इससे इतर है और जनता भी उसे समझने लगी है।
विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने की मुहिम चला रहे योग गुरु रामदेव को केंद्र सरकार की मुखालफत भारी पड़ी। चार जून 2011 को राजधानी के रामलीला मैदान में प्रदर्शन के दौरान आधी रात को दिल्ली पुलिस ने लाठियां चला कर बाबा को भागने पर मजबूर कर दिया। महिलाओं के कपड़े पहन कर भागे योग गुरु ने उसके बाद आरोप लगाया कि सरकार उनकी हत्या की साजिश रच रही थी। इसके बाद शुरू हुआ कांग्रेस का खेल। उसने रामदेव के सबसे करीबी सहयोगी बालकृष्ण के खिलाफ नेपाल का नागरिक होते हुए भारतीय पासपोर्ट रखने का मामला खोल दिया और उन्हें गिरफ्तार कराकर जेल भेज दिया। इसके बाद बाबा को तोड़ने के लिए कांग्रेस नेताओं ने तरह-तरह के आरोप लगाए। हालांकि इससे रामदेव कुछ कमजोर जरूर हुए, लेकिन उनकी मुहिम जारी है।
इसके बाद बारी आई प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे की। अप्रैल 2011 में देश से भ्रष्टाचार मिटाने की हुंकार भरने वाले अन्ना के दिल्ली में हुए अनशन में आमजन की भागीदार ने केंद्र सरकार की पेशानी पर पसीना ला दिया। पूरे देश में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए उठ खड़े हुए आंदोलन ने कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की नींद उड़ा दी। आनन-फानन में हजारे का अनशन तुड़वाने के लिए लोकपाल बनाने का आश्वासन दिया गया। लोकपाल के लिए कमेटी भी बना दी गई। मगर, कई मैराथन बैठकों के बावजूद अन्ना को दिया आश्वासन पूरा नहीं किया गया। और कई बड़े सुझावों को दरकिनार कर सभी दलों ने मिलकर अपने हिसाब से लोकपाल बना लिया। इस पूरी प्रक्रिया के बाद अन्ना ने फिर से हुंकार भरी। मीडिया दोबारा उनके पक्ष में माहौल न बनाए इसलिए पहले से सरकार के इशारे पर कुछ मीडिया मैनेजरों ने बड़ी सफाई से अन्ना को खबरों से गायब करा दिया। कभी अखबारों और चैनलों के लिए सुर्खियां बनाने वाले अन्ना के देश भर में चल रहे दौरे को लगभग नजरअंदाज कर जनता के जेहन से भुला दिया गया।
कांग्रेस की इस मुहिम का ताजा शिकार बने हैं पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह। कभी देश के सेनापति रहे वीके सिंह पर सरकार की नजर तब से टेढ़ी है जब से उन्होंने अरविन्द केजरीवाल से अलग होकर अपना अलग आंदोलन चला रहे अन्ना का साथ देना शुरू किया। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से चिढ़ी सरकार ने पूर्व सेना प्रमुख होने के नाते उनको मिली सुरक्षा वापस ले ली। उसके बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की हरियाणा में हुई पूर्व सैनिकों की रैली में शिरकत ने सरकार के गुस्से की आग में घी डालने का काम कर दिया। केंद्र ने तुरंत ही पूर्व सेनाध्यक्ष के कार्यकाल में गठित खुफिया यूनिट टेक्निकल सपोर्ट डिवीजन (टीएसडी) पर सेना की रिपोर्ट मीडिया में लीक होने की जांच की बात कर दी। दरअसल, रिपोर्ट में कहा गया कि सेनाध्यक्ष रहते हुए सिंह ने जम्मू-कश्मीर की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की। जवाब में वीके सिंह ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि आजादी के बाद से ही सेना जम्मू-कश्मीर में कुछ मंत्रियों को पैसा मुहैया कराती रही है। सिंह का यह बयान आते ही सियासी भूचाल मच गया। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तुरंत ही पैसा लेने वाले मंत्रियों के नाम उजागर करने की मांग कर दी। साथ ही इस पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग भी उठ गई। मामला बड़ा होते देख वीके सिंह के तेवर ढीले पड़ गए और बैकफुट पर आते हुए उन्होंने बयान बदलते हुए कहा कि सेना जनता से जुड़े कार्यों के लिए पैसा मुहैया कराती है। एक ही दिन में वीके सिंह के तेवरों में आए इतने परिवर्तन से एक बात साफ है कि अकेले सरकार से मुचैटा लेने का माद्दा रखना खतरनाक साबित हो सकता है। वीके सिंह ने आने वाले खतरे को भांपते हुए बयान को हल्का करने में ही अपनी भलाई समझी। खैर, इन सब बातों का निचोड़ यह है कि कांग्रेस की सरकार अपने खिलाफ उठने वाले विरोधियों के सुर को नक्कारखाने की तूती की मानिंद खामोश करना बखूबी जानती है। विरोधियों की किस नब्ज को दबाने से उसे जीत मिलेगी इस फन में उसके कारखास पूरी तरह से मंजे हुए हैं।

‘तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की
ये एहतियात जरूरी है इस बहर के लिए’

Tuesday, October 1, 2013

अखिलेश की राह पर राहुल

  अखिलेश की राह पर राहुल
एक साल कुछ महीने पहले की बात है, उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित हो चुकी थीं। सभी दल प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे थे। दूसरे दलों के नेताओं को तोड़कर अपने पाले में लाने के ‘मिशन’ चल रहे थे। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव के समाजवादी पार्टी में शामिल होने की घोषणा होती है। उसके ठीक बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और चुनाव की कमान संभाल रहे अखिलेश यादव ने बगावती तेवर दिखाते हुए दागी नेता को पार्टी में लेने से इनकार कर दिया था। अपने वरिष्ठ नेताओं से अलग जाकर उठाए गए अखिलेश के इस कदम ने चुनाव प्रचार का रुख बदल दिया। रातोंरात अखिलेश युवाओं के लिए आइकन बन गए और एक उम्मीद जागी कि अगर इस बार सपा सत्ता में आती है तो उसका कार्यकाल अपनी पुरानी छवि से इतर होगा। इसके बाद आए नतीजों ने सारे चुनावी पंडितों की भविष्यवाणी को फेल कर दिया। जनता ने अखिलेश की बेदाग और बेखौफ छवि पर भरोसा कर पूर्ण बहुमत देकर यूपी की सत्ता सौंप दी।
अब बात करते हैं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की। राहुल भी अब सपा के अपनाए नुस्खे को आजमाना चाह रहे हैं। वह दागी नेताओं को बचाने के लिए लाए जा रहे अध्यादेश का विरोध कर जनता के बीच बेदाग छवि के लोकतंत्र की स्थापना में विश्वास का संदेश देना चाहते हैं। मगर, यह विरोध कुछ नाटकीय सा लगता है। कारण... इस बात पर विश्वास करना मुश्किल है कि अध्यादेश के राष्टÑपति के पास जाने से पहले राहुल गांधी को न पता हो कि उसमें क्या लिखा है। यह भी साफ है कि अध्यादेश के विषय में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पूरी जानकारी थी क्योंकि उसके बिना यह पूरा ही नहीं हो सकता है। सब जानते हैं कि राहुल को कुर्सी सौंपने के लिए स्वयं पीएम डॉ. मनमोहन सिंह कई बार पेशकश कर चुके हैं। अब ऐसी पार्टी में जहां पदाधिकारी से लेकर कार्यकर्ता तक सभी एक दिन-रात एक ही स्वप्न देखते हैं कि राहुल पीएम बन जाएं वहां इतना बड़ा अध्यादेश तैयार हुआ और राष्टÑीय उपाध्यक्ष को हवा भी न लगे यह बात गले नहीं उतरती है। अगर पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो मामला साफ समझ में आ जाता है। सबसे पहले सरकार अध्यादेश कैबिनेट में पास कराकर राष्टÑपति प्रणब मुखर्जी की मुहर लगने भेजती है। अध्यादेश देखने के बाद प्रणब सरकार के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ को बुलाकर पूछते हैं कि इस बिल को इतनी जल्दबाजी में लाने की क्या आवश्यकता है। बस यह प्रश्न सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन गया। मुख्य विपक्षी दल भाजपा व केजरीवाल की आप ने राष्टÑपति से इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करने की मांग की। वहीं, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, मिलिंद देवड़ा और संदीप दीक्षित भी अध्यादेश के विरोध में खड़े हो गए। इस पर सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने विरोध करने वालों को पहले पूरा अध्यादेश पढ़ने की नसीहत दे डाली। अंदरूनी घमासान और बाहरी हमलों से पार्टी की स्थिति असहज हो गई। इसके बाद राहुल गांधी एक क्रांतिकारी की भूमिका में आते हैं और बिल को बकवास बताते हुए फाड़कर कूड़े में फेंकने को कहते हैं। राहुल की विरोध वाली इमेज मीडिया में छा गई। हर चैनल और अखबार ने इस खबर को हाथोंहाथ लिया। कॉमनवेल्थ, कोलगेट, ट्रैट्रा ट्रक, वाड्रा-डीएलएफ समेत कई घोटालों के दंश से बेजार हो रही पार्टी को एक ईमानदार युवा नेता के हाथों में देख आम जनता में भी यह चर्चा का विषय बन गया है।
अब इसके पीछे के खेल को समझने की कोशिश करते हैं। दरअसल, पुराने कई घोटालों के खुलने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के आरोप पार्टी पर लगते रहे हैं। और बचीखुची कसर दागियों को बचाने वाले बिल ने पूरी कर दी। ऐसे में राहुल गांधी के बयान ने चौरतरफा घिरी पार्टी को भी बचाव का रास्ता दे दिया और खुद को भी अखिलेश यादव की तरह एंग्री यंग मैन की तरह जनता के सामने पेश कर दिया। हालांकि, राहुल अपनी इस इमेज को कब तक कायम रख पाएंगे और उनको अखिलेश की तरह जनता का साथ मिलेगा कि नहीं यह सामने आने में अभी लंबा समय लगेगा।