अखिलेश की राह पर राहुल
एक साल कुछ महीने पहले की बात है, उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित हो चुकी थीं। सभी दल प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे थे। दूसरे दलों के नेताओं को तोड़कर अपने पाले में लाने के ‘मिशन’ चल रहे थे। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव के समाजवादी पार्टी में शामिल होने की घोषणा होती है। उसके ठीक बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और चुनाव की कमान संभाल रहे अखिलेश यादव ने बगावती तेवर दिखाते हुए दागी नेता को पार्टी में लेने से इनकार कर दिया था। अपने वरिष्ठ नेताओं से अलग जाकर उठाए गए अखिलेश के इस कदम ने चुनाव प्रचार का रुख बदल दिया। रातोंरात अखिलेश युवाओं के लिए आइकन बन गए और एक उम्मीद जागी कि अगर इस बार सपा सत्ता में आती है तो उसका कार्यकाल अपनी पुरानी छवि से इतर होगा। इसके बाद आए नतीजों ने सारे चुनावी पंडितों की भविष्यवाणी को फेल कर दिया। जनता ने अखिलेश की बेदाग और बेखौफ छवि पर भरोसा कर पूर्ण बहुमत देकर यूपी की सत्ता सौंप दी।
अब बात करते हैं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की। राहुल भी अब सपा के अपनाए नुस्खे को आजमाना चाह रहे हैं। वह दागी नेताओं को बचाने के लिए लाए जा रहे अध्यादेश का विरोध कर जनता के बीच बेदाग छवि के लोकतंत्र की स्थापना में विश्वास का संदेश देना चाहते हैं। मगर, यह विरोध कुछ नाटकीय सा लगता है। कारण... इस बात पर विश्वास करना मुश्किल है कि अध्यादेश के राष्टÑपति के पास जाने से पहले राहुल गांधी को न पता हो कि उसमें क्या लिखा है। यह भी साफ है कि अध्यादेश के विषय में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पूरी जानकारी थी क्योंकि उसके बिना यह पूरा ही नहीं हो सकता है। सब जानते हैं कि राहुल को कुर्सी सौंपने के लिए स्वयं पीएम डॉ. मनमोहन सिंह कई बार पेशकश कर चुके हैं। अब ऐसी पार्टी में जहां पदाधिकारी से लेकर कार्यकर्ता तक सभी एक दिन-रात एक ही स्वप्न देखते हैं कि राहुल पीएम बन जाएं वहां इतना बड़ा अध्यादेश तैयार हुआ और राष्टÑीय उपाध्यक्ष को हवा भी न लगे यह बात गले नहीं उतरती है। अगर पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो मामला साफ समझ में आ जाता है। सबसे पहले सरकार अध्यादेश कैबिनेट में पास कराकर राष्टÑपति प्रणब मुखर्जी की मुहर लगने भेजती है। अध्यादेश देखने के बाद प्रणब सरकार के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ को बुलाकर पूछते हैं कि इस बिल को इतनी जल्दबाजी में लाने की क्या आवश्यकता है। बस यह प्रश्न सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन गया। मुख्य विपक्षी दल भाजपा व केजरीवाल की आप ने राष्टÑपति से इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करने की मांग की। वहीं, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, मिलिंद देवड़ा और संदीप दीक्षित भी अध्यादेश के विरोध में खड़े हो गए। इस पर सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने विरोध करने वालों को पहले पूरा अध्यादेश पढ़ने की नसीहत दे डाली। अंदरूनी घमासान और बाहरी हमलों से पार्टी की स्थिति असहज हो गई। इसके बाद राहुल गांधी एक क्रांतिकारी की भूमिका में आते हैं और बिल को बकवास बताते हुए फाड़कर कूड़े में फेंकने को कहते हैं। राहुल की विरोध वाली इमेज मीडिया में छा गई। हर चैनल और अखबार ने इस खबर को हाथोंहाथ लिया। कॉमनवेल्थ, कोलगेट, ट्रैट्रा ट्रक, वाड्रा-डीएलएफ समेत कई घोटालों के दंश से बेजार हो रही पार्टी को एक ईमानदार युवा नेता के हाथों में देख आम जनता में भी यह चर्चा का विषय बन गया है।
अब इसके पीछे के खेल को समझने की कोशिश करते हैं। दरअसल, पुराने कई घोटालों के खुलने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के आरोप पार्टी पर लगते रहे हैं। और बचीखुची कसर दागियों को बचाने वाले बिल ने पूरी कर दी। ऐसे में राहुल गांधी के बयान ने चौरतरफा घिरी पार्टी को भी बचाव का रास्ता दे दिया और खुद को भी अखिलेश यादव की तरह एंग्री यंग मैन की तरह जनता के सामने पेश कर दिया। हालांकि, राहुल अपनी इस इमेज को कब तक कायम रख पाएंगे और उनको अखिलेश की तरह जनता का साथ मिलेगा कि नहीं यह सामने आने में अभी लंबा समय लगेगा।
एक साल कुछ महीने पहले की बात है, उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित हो चुकी थीं। सभी दल प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे थे। दूसरे दलों के नेताओं को तोड़कर अपने पाले में लाने के ‘मिशन’ चल रहे थे। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव के समाजवादी पार्टी में शामिल होने की घोषणा होती है। उसके ठीक बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और चुनाव की कमान संभाल रहे अखिलेश यादव ने बगावती तेवर दिखाते हुए दागी नेता को पार्टी में लेने से इनकार कर दिया था। अपने वरिष्ठ नेताओं से अलग जाकर उठाए गए अखिलेश के इस कदम ने चुनाव प्रचार का रुख बदल दिया। रातोंरात अखिलेश युवाओं के लिए आइकन बन गए और एक उम्मीद जागी कि अगर इस बार सपा सत्ता में आती है तो उसका कार्यकाल अपनी पुरानी छवि से इतर होगा। इसके बाद आए नतीजों ने सारे चुनावी पंडितों की भविष्यवाणी को फेल कर दिया। जनता ने अखिलेश की बेदाग और बेखौफ छवि पर भरोसा कर पूर्ण बहुमत देकर यूपी की सत्ता सौंप दी।
अब बात करते हैं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की। राहुल भी अब सपा के अपनाए नुस्खे को आजमाना चाह रहे हैं। वह दागी नेताओं को बचाने के लिए लाए जा रहे अध्यादेश का विरोध कर जनता के बीच बेदाग छवि के लोकतंत्र की स्थापना में विश्वास का संदेश देना चाहते हैं। मगर, यह विरोध कुछ नाटकीय सा लगता है। कारण... इस बात पर विश्वास करना मुश्किल है कि अध्यादेश के राष्टÑपति के पास जाने से पहले राहुल गांधी को न पता हो कि उसमें क्या लिखा है। यह भी साफ है कि अध्यादेश के विषय में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पूरी जानकारी थी क्योंकि उसके बिना यह पूरा ही नहीं हो सकता है। सब जानते हैं कि राहुल को कुर्सी सौंपने के लिए स्वयं पीएम डॉ. मनमोहन सिंह कई बार पेशकश कर चुके हैं। अब ऐसी पार्टी में जहां पदाधिकारी से लेकर कार्यकर्ता तक सभी एक दिन-रात एक ही स्वप्न देखते हैं कि राहुल पीएम बन जाएं वहां इतना बड़ा अध्यादेश तैयार हुआ और राष्टÑीय उपाध्यक्ष को हवा भी न लगे यह बात गले नहीं उतरती है। अगर पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो मामला साफ समझ में आ जाता है। सबसे पहले सरकार अध्यादेश कैबिनेट में पास कराकर राष्टÑपति प्रणब मुखर्जी की मुहर लगने भेजती है। अध्यादेश देखने के बाद प्रणब सरकार के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ को बुलाकर पूछते हैं कि इस बिल को इतनी जल्दबाजी में लाने की क्या आवश्यकता है। बस यह प्रश्न सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन गया। मुख्य विपक्षी दल भाजपा व केजरीवाल की आप ने राष्टÑपति से इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करने की मांग की। वहीं, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, मिलिंद देवड़ा और संदीप दीक्षित भी अध्यादेश के विरोध में खड़े हो गए। इस पर सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने विरोध करने वालों को पहले पूरा अध्यादेश पढ़ने की नसीहत दे डाली। अंदरूनी घमासान और बाहरी हमलों से पार्टी की स्थिति असहज हो गई। इसके बाद राहुल गांधी एक क्रांतिकारी की भूमिका में आते हैं और बिल को बकवास बताते हुए फाड़कर कूड़े में फेंकने को कहते हैं। राहुल की विरोध वाली इमेज मीडिया में छा गई। हर चैनल और अखबार ने इस खबर को हाथोंहाथ लिया। कॉमनवेल्थ, कोलगेट, ट्रैट्रा ट्रक, वाड्रा-डीएलएफ समेत कई घोटालों के दंश से बेजार हो रही पार्टी को एक ईमानदार युवा नेता के हाथों में देख आम जनता में भी यह चर्चा का विषय बन गया है।
अब इसके पीछे के खेल को समझने की कोशिश करते हैं। दरअसल, पुराने कई घोटालों के खुलने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के आरोप पार्टी पर लगते रहे हैं। और बचीखुची कसर दागियों को बचाने वाले बिल ने पूरी कर दी। ऐसे में राहुल गांधी के बयान ने चौरतरफा घिरी पार्टी को भी बचाव का रास्ता दे दिया और खुद को भी अखिलेश यादव की तरह एंग्री यंग मैन की तरह जनता के सामने पेश कर दिया। हालांकि, राहुल अपनी इस इमेज को कब तक कायम रख पाएंगे और उनको अखिलेश की तरह जनता का साथ मिलेगा कि नहीं यह सामने आने में अभी लंबा समय लगेगा।
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